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कहां है वन भैंसा? उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व से बाहर खदेड़ दिया वन भैंसों को,...

  रायपुर। 20 साल से छत्तीसगढ़ वन विभाग वन भैंसों के संरक्षण-संवर्धन पर करोड़ों खर्च चुका है। उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व में बाड़े में रखकर...

 


रायपुर। 20 साल से छत्तीसगढ़ वन विभाग वन भैंसों के संरक्षण-संवर्धन पर करोड़ों खर्च चुका है। उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व में बाड़े में रखकर वन भैंसे के बच्चों को जन्म दिलवाया। पूरे समय जनता को बताते रहे कि इनकी संख्या बढ़ रही है और अब पता चला है कि 10 दिन पहले वन विभाग ने इन्हें हाइब्रिड वन भैंसा बताकर उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व से 100 किलोमीटर दूर बाहर खदेड़ दिया है। कुछ जानकार लोग बता रहे हैं कि उन्हें ओड़िशा में ले जाकर छोड़ दिया गया है, ताकि ये वापस नहीं आ पाएं। रायपुर के वन्य जीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है।

कैसे खुली पोल? क्या है हाइब्रिड वन भैंसों का इतिहास

2007 में एक ग्रामीण से वन विभाग जबरदस्ती आशा नामक मादा को ले कर आए, इसे शुद्ध नस्ल का बताया गया। आशा ने राजा, प्रिंस, मोहन, वीरा, सोमू, खुशी और हीरा को जन्म दिया। बाद में 27 हजार रुपये में विभाग ने ग्रामीणों से रंभा और मेनका नाम की दो क्रॉस मादा खरीदी। रंभा और मेनका ने मालती और भानुमति को जन्म दिया। चारों ने पार्वती, विष्णु, दुर्गा, किरण, कान्हा, प्रह्लाद, रवि, सोमवती, जानकी, उर्वशी और सूर्या (15 से ज्यादा) को जन्म दिया।

वन विभाग को पहले दिन से ही पता था कि आशा सहित ये सभी हाइब्रिड वन भैंसे हैं। रंभा और मेनका की खरीदी के कागज़ में ही लिखा है कि दोनों क्रॉस ब्रीड हैं। वन विभाग की पोल तब खुली जब केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने इन वन भैसों को हाइब्रिड बता कर, असम के प्योर ब्रीड वन भैंसों के साथ प्रजनन के लिए स्वीकृति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद अचानक वन विभाग को समझ में आया और उसे भारत के संविधान की याद आई। अनुच्छेद 48(ए) और 51(ए)(जी) के प्रावधानों का हवाला देते हुए, उप निदेशक यूएसटीआर ने सभी हाइब्रिड वन भैंसों को छोड़ने का प्रस्ताव रखा। बाद में अक्टूबर 2023 में इन्हें बाड़े से भगा दिया। बताया गया कि बाड़ा तोड़कर भाग गए।

यूएसटीआर में बड़ी संख्या में गांव होने के कारण, इन हाइब्रिड वन भैंसों ने फसलों को नुकसान पहुंचाना शुरू किया। ग्रामीणों ने मुआवज़े की मांग की, लेकिन वन विभाग ने हाइब्रिड वन जानवरों के कारण होने वाले फसल नुकसान की भरपाई के लिए प्रावधानों की कमी का हवाला देते हुए इनकार कर दिया। नतीजा यह निकला कि अगस्त 2024 में, लाठी-डंडे की मदद से ग्रामीणों ने हाइब्रिड वन भैंसों को पुराने बोमा में रख दिया। बाद में फसल के समय ये बाड़े में रहते थे, बाकी समय जंगल में। सिंघवी ने बताया कि अब 10 दिन पहले इन्हें उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व से बाहर 100 किलो मीटर दूर छोड़ दिया गया है।

खर्च किए 2,46,38,831.00 रुपए

वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक वन विभाग ने इन पर भोजन और पूरक आहार, बाड़े का रख-रखाव और कई मदों पर 2,46,38,831.00 रुपए खर्च किए। अब वन विभाग पिछले छ: साल से बारनवापारा में बाड़े में कैद तीन मादा वन भैसों को उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व में एक मात्र बचे 26 वर्ष के “छोटू” वन भैंसे से — जिसे बुढ़ापे के कारण बिलकुल कम दिखता है — क्रॉस कराने लाने की तैयारी कर रहा है। बारनवापारा से लाने के 45 दिनों बाद इन्हें छोटू के साथ जंगल में छोड़ दिया जाएगा। ऐसे में अगर हाइब्रिड वन भैंसे भी उदंती-सीता नदी के जंगल में रहते, तो असम की प्योर ब्रीड मादा से इन हाइब्रिड नर वन भैंसों की मैटिंग की सम्भावना रहती। इसलिए इन्हें वन विभाग ने उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व के इलाके के बाहर छोड़ दिया है।

सिंघवी ने मांग की कि पूरे मामले को हाई-पावर कमेटी को जांच के लिए सौंपे

रायपुर के वन्य जीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने हाइब्रिड वन भैंसों पर करोड़ों खर्चा किए जाने को लेकर, एक हाई-पावर जांच कमेटी को सौंपने की मांग करते हुए कहा कि जांच कर दोषी अधिकारियों से पूरे खर्च की वसूली की जानी चाहिए।

सिंघवी ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) को पूछा कि जब असम के वन भैंसों को उदंती-सीता नदी ही लाना था, तो 2020 में बारनवापारा में लाकर क्यों बाड़े में कैद कर रखा है। 2020 में वे ही अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) थे। 2020 में जब छोटू 20–21 साल का था, तब असम की मादा को छोटू के पास लाया जाता, तो शायद प्रजनन की सम्भावना रहती। अब जब छोटू बूढ़ा हो गया है, जो कि प्रजनन भी न कर सके, तब यह प्रयोग क्यों किया जा रहा है? जिन तीन मादा को लाया जा रहा है, उनके छोटे बच्चे हैं। वे बारनवापारा में ही रहेंगे, जबकि उनकी उम्र माँ से सीखने की है।


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